महाराजा कोल्हापुर को उनकी 95वी पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि _/\_

_/\_ महाराजा कोल्हापुर को उनकी 95वी पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि _/\_ 6-मई-1922 को एक समाज सुधारक राजऋषि महात्मा, मात्र 50 वर्ष की अल्प आयु मे, इस धरा से शदा केलिए चला गया। छत्रपति शाहूजी महाराज (GCSI-GCIE-GCVO) ब्रिटिश कालीन भारत के 10 सर्वाधिक प्रभावशाली राज्यों मे से एक कोल्हापुर के शासक थे। उनके शासनकाल मे लिये गये जनकल्याणकारी फैंसलों की गूंज लंदन तक सुनाई पड़ती थी। ऐसे महापुरुष को उनकी पुण्यतिथि तिथि पर शत-शत नमन। सयाजी राजे गायकवाड़, गंगाधर तिलक, और अंबेडकर पर उनका गहरा प्रभाव था। उन्होंने अपने जीवन काल मे हर एक अपराधी को उचित दंड और हर विद्वान को यथायोग्य सत्कार दिया। धूर्त लोगों की कुटिलता को सही दंड देने मे वह कभी पछे नहीं रहे। महाराजा कोल्हापुर का यह दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा मे मानव समाज के सभी दुखों को हरने की अपार शक्ति है। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने अपने राज्यक्षेत्र मे सभी केलिए निशुल्क अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था की। माध्यमिक व उच्च शिक्षा केलिए कोल्हापुर शहर मे महाराजा ने 22 छात्रावासों का निर्माण कराया। कोल्हापुर राज्य को सूखे और बाढ़ से निजात दिलाने केलिए उन्होंने प्रख्यात इंजीनियर विश्वेशरैया जी से एक विशालकाय बांध का निर्माण कराया। इस बाध की सिचाई सुविधाओं का लाभ कोल्हापुर के किसान आज भी ले रहे हैं। कृषि के उचित प्रबंधन केलिए उन्होंने कई यूरोपीय विशेषज्ञों को अपनी राजकीय सेवा मे रखा हुआ था। अछूत समझे जाने वाले समाज के लोगों को समाज की मुख्यधारा जोड़ने केलिए उनका सर्वाधिक क्रांतिकारी निर्णय था उस समाज के लोगों को संपत्ति और भमि का अधिकार देना। उन्होंने अनेकों दलितों को भूमिधरी स्तर प्रदान किया। विठ्ठलभाई पटेल का हिंदू कोड बिल नेशनल असेंषली मे अस्वीकृत होने पर भी कोल्हापुर पहला ऐसा राज्य बना जहाँ हिंदू कोड बिल प्रभाव मे आया। इसके माध्यम से महाराजा ने विधवा पुनर्विवाह पर जोर दिया। उनके द्वारा सुरू किये गये अनेकानेक प्रयास आधुनिक भारत के निर्माण मे नींव का पत्थर साबित हुए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, उनके अधिकांश प्रकल्पों को भारत के समग्र विकास के लिये उपयोगी व प्रभावी मानते हुए स्वीकृति प्रदान की गई। परजीवी समाज के निकम्मेपन को खत्म करने तथा राजकीय सेवाओं मे दक्षता और पारदर्शिता लाने केलिए उन्होंने श्रमजीवी समाज के लोगों को राजकीय सेवा मे लेना सुरू किया। इस उद्देश्य मे अड़चन डालने वालों को किनारे करने के लिए महाराजा ने राजकीय सेवाओं मे श्रमजीवी समाज के लोगों केलिए पहले 50% और फिर बाद मे 90% आरक्षण की व्यवस्था लागू की। लेकिन आरक्षण लागू करते हुए महाराजा ने कभी भी दक्षता और कार्यकुशलता से समझौता नहीं किया। आरक्षण लागू करते समय उन्होंने यह कभी नहीं सोचा होगा कि उनका अपना समाज भी इतना कमजोर और लाचार सो जाएगा कि उसे भी आरक्षण की जरूरत पड़ेगी। शिक्षा की समुचित व्यवस्था मे अपना सहयोग प्रदान कर हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं। उनका कहना था "कल न मै होंऊगा, न आप होंगे, न राजा होंगे, न रजवाड़े होंगे। मगर यह राष्ट्र हमेशा रहेगा और हमे इसको आगे बढ़ने का काम करते रहना है। समाज मे सबको सम्मान मिले, सभी शिक्षित होकर राष्ट्र के उत्थान मे भागीदार बनें। तभी हमारा जीवन सफल माना जायेगा।" आज का भारत सदैव उनका ऋणी रहेगा। ऐसे दिव्य महापुरुष को विनम्र श्रद्धांजलि।